हर दौर का हीरो
ध्रुव बाबा कहते हैं: "हर दौर में मुश्किलें आईं, और हर दौर में किसी न किसी ने उनसे लोहा लिया।" ये उन्हीं में से कुछ के छोटे-छोटे किस्से हैं।
भारत के नक्शे पर हर हीरो की जगह, जल्द
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
बचपन में कलाम अख़बार बाँटकर अपनी पढ़ाई में मदद करते थे। एक दिन उनके टीचर उन्हें समुद्र किनारे ले गए और उड़ते पक्षी दिखाकर समझाया कि पक्षी उड़ते कैसे हैं। उसी दिन नन्हे कलाम ने उड़ान का सपना देखा, और बड़े होकर वे देश के बड़े वैज्ञानिक और राष्ट्रपति बने।
प्रतीक: उड़ता पक्षी · व्योम के किस्सों में
आर्यभट
करीब डेढ़ हज़ार साल पहले, जब न दूरबीन थी न कंप्यूटर, आर्यभट रात-रात भर आसमान को देखते और हिसाब लगाते। उन्होंने बताया कि धरती अपनी धुरी पर घूमती है, इसीलिए दिन और रात होते हैं।
प्रतीक: घूमती धरती · व्योम के किस्सों में
ईश्वरचंद्र विद्यासागर
कहा जाता है कि नन्हे ईश्वरचंद्र अपने पिता के साथ गाँव से कलकत्ता पैदल जा रहे थे। रास्ते में लगे मील के पत्थरों पर लिखे अंक देखते-देखते उन्होंने अंग्रेज़ी की गिनती सीख ली। ऐसी ही लगन से वे इतने बड़े विद्वान बने कि लोग उन्हें "विद्यासागर", यानी विद्या का सागर, कहने लगे।
प्रतीक: सड़क का मील का पत्थर · इरा के किस्सों में
सावित्रीबाई फुले
सावित्रीबाई ने उस ज़माने में लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया, जब बहुत से लोग इसके ख़िलाफ़ थे। रास्ते में कुछ लोग उन पर कीचड़ फेंकते थे। वे हार नहीं मानीं और थैले में एक दूसरी साड़ी रखकर चलने लगीं, ताकि स्कूल पहुँचकर बदल सकें और पढ़ाई एक दिन भी न रुके।
प्रतीक: थैले में रखी एक साड़ी · इरा के किस्सों में
मैरी कॉम
छोटे से गाँव की मैरी से लोग कहते थे कि लड़कियाँ बॉक्सिंग नहीं करतीं। मैरी ने रोज़ कसरत की, अच्छा खाया, पूरी नींद ली और मेहनत करती रहीं। आगे चलकर वे कई बार विश्व चैंपियन बनीं।
प्रतीक: बॉक्सिंग के दस्ताने · ओजस के किस्सों में
मिल्खा सिंह
मिल्खा सिंह रोज़ सुबह दौड़ते, चाहे गर्मी हो या ठंड। इसी लगन से वे इतना तेज़ दौड़ने लगे कि लोग उन्हें प्यार से "फ़्लाइंग सिख", यानी उड़ने वाला सिख, कहने लगे।
प्रतीक: दौड़ के जूते · ओजस के किस्सों में
लाल बहादुर शास्त्री
शास्त्री जी देश के प्रधानमंत्री बने, फिर भी उनका जीवन बिल्कुल सादा रहा। जब देश में अनाज की कमी हुई, तो उन्होंने लोगों से हफ़्ते में एक समय का खाना छोड़ने को कहा, और सबसे पहले खुद यही किया। उन्होंने "जय जवान, जय किसान" का नारा दिया।
प्रतीक: सादी धोती और गेहूँ की बाली · सहज के किस्सों में
दशरथ मांझी
दशरथ मांझी के गाँव और शहर के बीच एक पहाड़ था, जिसकी वजह से लोगों को बहुत लंबा घूमकर जाना पड़ता था। उन्होंने छेनी-हथौड़ी उठाई और रोज़ थोड़ा-थोड़ा करके, बरसों की मेहनत से, पहाड़ के बीच रास्ता बना दिया। लोग उन्हें "माउंटेन मैन" कहते हैं।
प्रतीक: पहाड़ के बीच बना रास्ता · अरण्य के किस्सों में
रानी लक्ष्मीबाई
बचपन में सब उन्हें प्यार से "मनु" कहते थे। मनु घुड़सवारी में बहुत तेज़ थीं और किसी से कम नहीं थीं। बड़ी होकर वे झाँसी की रानी बनीं और अपने लोगों के लिए पूरी हिम्मत से खड़ी रहीं।
प्रतीक: दौड़ता घोड़ा · अरण्य के किस्सों में
रानी अब्बक्का चौटा
अब्बक्का समुद्र किनारे की एक छोटी-सी जैन रियासत की रानी थीं। उनसे कहीं बड़े और ताकतवर विदेशी जहाज़ी उनके तट पर क़ब्ज़ा करना चाहते थे, पर रानी अपने लोगों के साथ डटी रहीं और झुकीं नहीं।
प्रतीक: समुद्र किनारे का किला · अरण्य के किस्सों में
बिरसा मुंडा
बिरसा मुंडा को अपने जंगल, अपनी ज़मीन और अपने लोगों से गहरा प्यार था। वे अपने लोगों के हक़ के लिए खड़े हुए, इसलिए आज भी लोग उन्हें आदर से "धरती आबा", यानी धरती के पिता, कहते हैं।
प्रतीक: साल का पेड़ · अरण्य के किस्सों में
रवींद्रनाथ टैगोर
टैगोर को बचपन में बंद कमरों वाली कक्षा बिल्कुल पसंद नहीं थी। बड़े होकर उन्होंने शांतिनिकेतन में ऐसा स्कूल बनाया, जहाँ बच्चे पेड़ों के नीचे, खुले आसमान तले पढ़ते, गाते और चित्र बनाते थे।
प्रतीक: पेड़ के नीचे बैठी कक्षा · नक्ष के किस्सों में
रोज़ के हीरो
जो किसान हमारे लिए अनाज उगाते हैं, जो नर्स रात भर मरीज़ों का ध्यान रखती हैं, जो डाकिया चिट्ठियाँ पहुँचाते हैं और जो सफ़ाईकर्मी हमारी गलियाँ साफ़ रखते हैं, वे भी हीरो हैं। आज किसी एक को "शुक्रिया" ज़रूर कहना।
प्रतीक: किसान, नर्स, डाकिया · सिया के किस्सों में